नीमच। सरकारी तंत्र में बैठे 'रिश्वतखोरों' पर उज्जैन लोकायुक्त की टीम ने ऐसा जाल फेंका कि बड़े-बड़े सूरमा चित्त हो गए! नीमच के आदिम जाति कल्याण विभाग में उस वक्त हड़कंप मच गया, जब विभाग के जिला संयोजक राकेश राठौर और उत्कृष्ट बालक छात्रावास के अधीक्षक हरीश चौहान को लोकायुक्त ने 1 लाख रुपये की नगदी के साथ रंगे हाथों दबोच लिया।

 

कहते हैं न, 'पाप का घड़ा एक दिन जरूर भरता है'—इस मामले में तो रिश्वत की गड्डी सीधे साहब की पैंट की जेब से बरामद हुई है!

 

💸 'जांच' का खौफ दिखाकर मांगी थी सवा लाख की 'मलाई'

पूरा मामला बेहद चौंकाने वाला है। जूनियर कन्या छात्रावास कुकड़ेश्वर की निलंबित अधीक्षिका कुर्दुला एक्का पर कथित अनियमितताओं के चलते विभागीय जांच चल रही थी। इसी मजबूरी का फायदा उठाने के लिए इन दोनों 'साहबों' ने जाल बुना।

 

डील क्या थी?

विभागीय जांच में मदद करने और रुका हुआ पुराना वेतन (सैलरी) जारी करवाने के एवज में 1.25 लाख रुपये की मोटी घूस मांगी गई थी।

 

पीड़िता ने घुटने टेकने के बजाय लोकायुक्त की शरण ली और भ्रष्टाचारियों को उनके अंजाम तक पहुंचाने की ठान ली।

 

 लोकायुक्त का 'मास्टरस्ट्रोक' और पैंट की जेब से निकली गड्डी!

शिकायत मिलते ही लोकायुक्त एसपी आनंद कुमार यादव के मार्गदर्शन में एक सीक्रेट प्लान तैयार किया गया। जैसे ही शिकायतकर्ता केमिकल लगे नोटों से भरे 1 लाख रुपये लेकर पहुंची, दोनों आरोपियों ने बड़ी बेफिक्री से रकम थाम ली।

 

लेकिन उन्हें क्या पता था कि लोकायुक्त की टीम पल-पल की हरकत पर नजर रखे हुए थी। इशारा मिलते ही टीम ने छापा मारा और आरोपी हरीश चौहान की पैंट की दाहिनी जेब से कड़कड़ाते हुए नोट बरामद कर लिए। जब आरोपियों के हाथ धुलवाए गए, तो रिश्वत की लालच उनके गुलाबी हाथों के रूप में सबके सामने आ गई।

 

नए कानून की धाराओं में कसेगा शिकंजा

इस हाई-प्रोफाइल ट्रैप के बाद लोकायुक्त पुलिस ने दोनों आरोपियों के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 (संशोधित 2018) की धारा-7 और नए कानून भारतीय न्याय संहिता (BNS) 2023 की धारा 61(2) के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया है। अब दोनों की कुर्सी भी खतरे में है और जेल की हवा खाना भी तय माना जा रहा है।

 

इस 'सिंघम' टीम ने किया शिकार।

इस बंपर कार्रवाई को अंजाम देने वाले जांबाजों में शामिल थे।

 

कमान। डीएसपी दिनेशचंद्र पटेल और निरीक्षक हीना डावर।

 

सपोर्ट टीम। प्रधान आरक्षक हितेश ललावत, आरक्षक उमेश जाटव, श्याम शर्मा, मोहम्मद इसरार, संजीव कुमारिया और कंप्यूटर ऑपरेटर अंजली पुरानिया।

 

बड़ा सबक। इस कार्रवाई ने साफ कर दिया है कि अगर कोई अधिकारी खुद को 'भगवान' समझकर रिश्वत की मांग करता है, तो कानून के हाथ उसकी जेब तक पहुंचने में देर नहीं लगाते!