खौफ, आक्रोश या प्रशासनिक नाकामी? जावद में 11 साल बाद भी त्योहारों पर पसरा रहता है सन्नाटा!

जावद।कहते हैं कि वक्त बीतने के साथ बड़े से बड़े जख्म भी भर जाते हैं, लेकिन मालवा अंचल के ऐतिहासिक नगर जावद में ऐसा देखने को नहीं मिल रहा है। साल 2015 में हुए एक सांप्रदायिक दंगे के 11 साल बीत जाने के बाद भी नगर में खौफ और विरोध का एक ऐसा अनूठा सन्नाटा पसरा हुआ है, जिसे तोड़ने में स्थानीय प्रशासन आज तक नाकाम रहा है। आलम यह है कि आज भी हर मुस्लिम त्योहार के मौके पर जावद के हिंदू व्यापारी और दुकानदार स्वेच्छा से अपनी दुकानें पूरी तरह बंद रखते हैं।

 

क्या था 11 साल पुराना वह मामला?

साल 2015 में हनुमान जयंती के पावन अवसर पर नगर में हर वर्ष की तरह पारंपरिक और शांतिपूर्ण तरीके से जुलूस निकाला जा रहा था। इसी दौरान कुछ असामाजिक तत्वों ने सोची-समझी साजिश के तहत जुलूस पर पथराव कर दिया।

मासूम और पुलिसकर्मी हुए थे लहूलुहान, इस अचानक हुए पथराव में जुलूस में शामिल छोटे-छोटे बच्चे और सुरक्षा में तैनात पुलिसकर्मी गंभीर रूप से घायल हो गए थे।

लगाना पड़ा था कर्फ्यू, स्थिति इतनी तनावपूर्ण हो गई थी कि नगर की शांति पूरी तरह भंग हो गई। बिगड़ते हालात को संभालने के लिए प्रशासन को जावद नगर में कड़ा कर्फ्यू लगाना पड़ा था, जिसके बाद जैसे-तैसे स्थिति पर काबू पाया गया।

 

 

विरोध या खौफ? आज तक सच नहीं जान पाया प्रशासन

 

2015 की उस कड़वी घटना के बाद से जावद के ताने-बाने में एक गहरा बदलाव आ गया। हिंदू त्योहार पर हुए उस पथराव के विरोध स्वरूप या असुरक्षा की भावना के चलते, स्थानीय व्यापारियों ने एक मौन तरीका अपनाया। तब से लेकर आज तक, जब भी कोई मुस्लिम त्योहार आता है, जावद नगर का पूरा बाजार स्वतः स्फूर्त (अपने आप) बंद हो जाता है।

बड़ा सवाल, 11 साल से अधिक का समय बीत जाने के बाद भी खुफिया तंत्र और स्थानीय प्रशासन इस बात की तह तक नहीं पहुंच पाया है कि इस निरंतर बंदी का असल कारण क्या है? क्या यह व्यापारियों का आंतरिक आक्रोश है, आपसी अविश्वास है या फिर सुरक्षा को लेकर कोई पुराना डर?

प्रशासन की कार्यप्रणाली पर उठ रहे गंभीर सवाल

इस पूरे मामले में कहीं न कहीं स्थानीय प्रशासन और पुलिस महकमे की लापरवाही और नाकामी साफ तौर पर उजागर होती है।

 

शांति समितियों की बैठकें सिर्फ औपचारिकता? हर साल त्योहारों से पहले शांति समिति की बैठकें बुलाई जाती हैं, लेकिन धरातल पर जावद के इस "मौन बंद" को खत्म कराने में कोई ठोस सफलता नहीं मिली।

भरोसा कायम करने में कमी: एक दशक से ज्यादा का समय बीत जाने के बाद भी प्रशासन व्यापारियों और दोनों समुदायों के बीच वह भरोसा कायम नहीं कर पाया, जिससे बाजार सामान्य रूप से खुल सकें।

11 साल बाद भी त्योहारों के मौके पर जावद की सड़कों पर पसरा यह सन्नाटा प्रशासनिक मुस्तैदी के दावों की पोल खोलता है। अब देखना यह है कि क्या भविष्य में कभी प्रशासन इस गतिरोध को तोड़कर जावद में पहले जैसा आपसी सौहार्द और चहल-पहल वापस ला पाता है या यह सन्नाटा यूं ही बदस्तूर जारी रहेगा।