- मृदा स्वास्थ्य पर रिसर्च में बड़ा खुलासा: सोना नहीं रही देसी मिट्टी, खो रही असली ताकत

भोपाल । देश की मिट्टी की तुलना भले ही सोने से होती रही हो पर इस सोने की चमक फीकी पडऩे लगी है। कृषि प्रधान देश भारत की मिट्टी अब अपनी असली ताकत खोती नजर आ रही है। ये चौंकाने वाला खुलासा हुआ है एक रिसर्च में, जिसमें सामने आया है कि देश की मिट्टी में ऑर्गेनिक कार्बन तेजी से घट रहा है, जिसके फलस्वरूप मिट्टी की उर्वरकता कम होती चली जा रही है। यह स्थिति बेहद गंभीर है क्योंकि इसका सीधा असर कृषि भूमि, फसलों और यहां तक की इंसानों पर भी पडऩा तय है। खेती के लिए जितना जमीन में खाद पानी जरूरी है, उससे कई अधिक जरूरी है ऑर्गेनिक कार्बन। क्योंकि ये तत्व उपजाऊ मिट्टी के लिए ऊर्जा स्रोत होता है। ऑर्गेनिक कार्बन ही वह तत्व है जो सभी पोषक तत्वों को संग्रहित कर पौध में ट्रांसफर करता है। जब मिट्टी में ऑर्गेनिक कार्बन की मात्र अच्छी होती है तो फसल में भी पोषक तत्व अच्छे से पहुचते हैं। लेकिन इसकी कमी हो जाए तो पौधे का विकास प्रभावित होता है। भारत की मृदाओं में ये तेजी से कम हो रहा है। इसका खुलासा राजमाता विजयाराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रोफेसर अरविंद कुमार शुक्ला और उनके साथ साथी कृषि विज्ञानिक संजीब के। बेहेरा, राहुल मिश्रा, विमल शुक्ला, सलविंदर एस धालीवाल, चेरुकुमल्ली श्रीनिवास राव, अमरेश के। नायक और मांगी एल। जाट की हालिया रिसर्च में हुआ है। फसल की उपज पर हो रहा था असर आम तौर पर पारंपरिक खेती कर रहे किसानों को संतुलित खाद की जानकारी नहीं है। बावजूद इसके किसान रात रात भर केमिकल खादों के लिए लाइन में लग कर खाद ले रहा है, इस सोच में कि, उसे बेहतर फसल मिलेगी। लेकिन यही वजह भी है कि खेती के दौरान किया गया फर्टिलाइजेशन किसानों की फसल पर असर डाल रहा है। बागबई से ग्वालियर कृषि महाविद्यालय आए एक किसान बृजेश रजक ने बताया कि उनके पास 15 बीघा जमीन है। वे हर साल तूर की फसल की बोवनी करते आए हैं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में फसल की उपज में कमी आ रही थी। जब उन्होंने ग्वालियर में अपनी मिट्टी की जांच कराई और कृषि विज्ञानियों से बात की तो पता चला कि मिट्टी में कमी थी। उनकी सलाह पर दो सालों से उन्होंने जैविक खाद का उपयोग शुरू किया तो उन्हें अच्छी फसल मिल रही है। बृजेश की तरह भिंड के किसान रवींद्र कुमार ने बताया, मैं बटाई पर खेती करता हूं। गेंहूं की फसल में दाने छोटे आने लगे थे तो भिंड के कृषि विज्ञान केंद्र में बताया। उन्होंने मिट्टी परीक्षण कराया और बताया कि मिट्टी में कार्बन की कमी है। इसके बाद उनकी सलाह पर हमने खेत में गोबर खाद के साथ वैज्ञानिकों द्वारा बताए गए खाद को डालना शुरू किया, तो पिछले साल गेंहू की फसल अच्छी हुई और दाना भी सामान्य था। ये अकेले बृजेश या रवीन्द्र की समस्या नहीं है देश के तमाम किसानों को इस परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। लेकिन जानकारी के अभाव में उनका नुकसान हो रहा है। इस बारे में प्रो. अरविंद कुमार शुक्ला ने बताया कि भारत वर्ष में मृदा (मिट्टी) स्वास्थ्य में कार्बन पदार्थ (ऑर्गेनिक कार्बन) की बड़ी महत्वता होती है। मिट्टी में ऑर्गेनिक कार्बन को जीवांश पदार्थ भी कहा जाता है। इसे जीवांश पदार्थ इसलिए कहा जाता है क्योंकि ये पेड़ पौधों गाय के गोबर और अन्य वनस्पतियों के अवशेष होते हैं, जो मिट्टी में मिलकर उसे उपजाऊ बनाते हैं। ऑर्गेनिक कार्बन सामान्यतौर पर किसी भी उपजाऊ मिट्टी में 5 प्रतिशत होना चाहिए लेकिन वैज्ञानिकों के पिछले शोधों में पाया गया है कि ऐसा होना संभव नहीं है और इसलिए किसी भी खेती युक्त भूमि की मिट्टी में कार्बन पदार्थ की उपलब्धता हर हाल में कम से कम 0.75 प्रतिशत होना ही चाहिए। लेकिन हालिया रिसर्च में ये पाया गया है कि भारत की 70 फीसदी मृदाओं में ऑर्गेनिक कार्बन 0.5 प्रतिशत से भी कम है। जल वायु परिवर्तन और असुंतलित खाद कमी की बड़ी वजह इस शोध में शामिल रहे प्रो. अरविंद शुक्ला के अनुसार, कार्बन पदार्थ की कमी मिट्टी में लगातार गलत तरीके से खेती करने से घट रहा है। इसके साथ ही उनका कहना है कि, ऑर्गेनिक कार्बन के घटने की सबसे बड़ी वजह जल वायु परिवर्तन है। जब ज्यादा गर्मी पड़ती है तो खुले खेत में जहां फसल नहीं होती, गर्मी की वजह से कार्बन पदार्थ जल जाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि यह मिट्टी की ऊपरी सतह में ही दो इंच तक मौजूद रहता है। पानी के साथ बह जाता है ऑर्गेनिक कार्बन ऑर्गेनिक कार्बन के कम होने का दूसरा बड़ा कारण ऐसी भूमि है जो ऊबडख़ाबड़ हैं या मिट्टी रेतीली हो। ऐसी भूमि पर कार्बन पदार्थ पानी या बारिश के साथ बह जाते हैं। इसके साथ ही तीसरी स्थिति तब बनती है जब खेती में असंतुलित खाद का उपयोग किया जाता है। तब फसल की वृद्धि ठीक से नहीं हो पाती पौध की जड़े ठीक से विकसित नहीं होती ऐसी स्थिति में जड़ों में ऑर्गेनिक कार्बन का योगदान जितना होना चाहिए उतना नहीं हो पाता है। देश के 620 जिलों से इक_ा किए ढाई लाख सैंपल प्रोफेसर अरविंद शुक्ला ने बताया कि इस रिसर्च के लिए पूरे भारत के 29 राज्यों से 620 जिलो के 2 लाख 54 हजार मृदाओं के जीपीएस बेस्ड सैंपल इक_ा किए गए, जिनकी जांच करने पर पाया गया कि नॉर्थ ईस्टर्न रीजन के कुछ भाग, हिमालयन रीजन के कुछ भाग और साउथ केरल के तटीय भागों को छोडक़र अधिकतर जमीनों में ऑर्गेनिक कार्बन की भारी कमी है। कहा जाए तो स्थिति भयावय है। इसलिए अब ऑर्गेनिक कार्बन बढ़ाने पर ध्यान देने की जरूरत है।