जावद | नगर परिषद जावद की कार्यप्रणाली इन दिनों एक बार फिर गंभीर सवालों और विवादों के घेरे में है। शहर की प्रकाश व्यवस्था को लेकर परिषद के दावे और जमीनी हकीकत में जमीन-आसमान का अंतर नजर आ रहा है। आलम यह है कि शहर का हृदय स्थल कहा जाने वाला मुख्य बस स्टैंड पिछले कई दिनों से रात के समय अंधेरे के आगोश में डूबा रहता है, जिससे राहगीरों और यात्रियों में भय का माहौल है।
कागजों पर 'रोशन' शहर, हकीकत में अंधेरा।
हैरानी की बात यह है कि एक ओर जहाँ नगर परिषद द्वारा लाइटों के रखरखाव, अकाउंटेंट और बिजली बिलों के नाम पर लाखों रुपये के बिल धड़ल्ले से पास किए जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर 'ग्राउंड स्ट्रेंथ' (जमीनी हकीकत) शून्य है। जनता का पैसा पानी की तरह बहाया जा रहा है, लेकिन इसका लाभ शहर की सड़कों पर नजर नहीं आ रहा।
अंधेरे में हादसे और अपराध का डर।
बस स्टैंड क्षेत्र में स्ट्रीट लाइटें बंद होने से न केवल व्यापारियों का व्यापार प्रभावित हो रहा है, बल्कि देर रात बस से उतरने वाले यात्रियों, विशेषकर महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा पर भी बड़ा खतरा मंडरा रहा है। अंधेरे का फायदा उठाकर असामाजिक तत्वों के सक्रिय होने और चोरी जैसी वारदातों का अंदेशा बढ़ गया है।
"लाखों के बिल पास होना और फिर भी शहर का अंधेरे में रहना किसी बड़े घोटाले की ओर इशारा करता है। आखिर जनता की गाढ़ी कमाई का पैसा किसकी जेब में जा रहा है?" > — स्थानीय नागरिक
जिम्मेदारों की चुप्पी पर सवाल।
कोई दिनों से लाइटें बंद होने और सोशल मीडिया से लेकर धरातल तक शिकायतें होने के बावजूद, नगर परिषद के जिम्मेदार अधिकारी कुंभकर्णी नींद सो रहे हैं। इस मामले में अब प्रशासन की मंशा पर भी प्रश्नचिह्न लग रहे हैं।
मुख्य मांगें:
• बंद पड़ी लाइटों को तत्काल प्रभाव से सुधारा जाए।
• लाखों के बिलों के भुगतान की निष्पक्ष जांच हो।
• लापरवाही बरतने वाले कर्मचारियों और ठेकेदारों पर कार्रवाई हो।
यदि जल्द ही नगर की प्रकाश व्यवस्था नहीं सुधारी गई, तो स्थानीय निवासियों ने उच्च स्तरीय जांच की चेतावनी दी है।